रिलेशनशिप टूटने का डर है तो काम आएंगे ये टिप्स, एक बार जरूर पढ़ें!

रिलेशनशिप टूटने का डर है तो काम आएंगे ये टिप्स, एक बार जरूर पढ़ें

जिंदगी में हर व्यक्ति को अपने लिए 'निजी स्पेस' की जरूरत होती है। इस निजी स्पेस को आप अपनी सलाहों से भर देने की कोशिश न करें। सलाहें उतनी ही अच्छी, जितनी जरूरी हो। पति-पत्नी के रिश्ते की मजबूती के लिए आप अपने सहयोग को देखें और परखें...कहीं ज्यादा तो नहीं हो रहा है। हर इंसान की जिंदगी में निजता बेहद जरूरी है, बेशक वह शादीशुदा ही क्यों न हो। और जब यह नहीं मिल पाती तो दोनों के बीच तनाव के साथ-साथ उनमें चिड़चिड़ापन भी बढ़ने लगता है। इस रिश्ते में सहयोग के साथ थोड़ी आलोचना भी जरूरी है।

“जब शरद से मेरी शादी हुई, उस समय वह अपने बिजनेस को सेट कर रहे थे। उसे संभालने के साथ-साथ उनके कंधों पर परिवार की जिम्मेदारियां भी थीं। सबसे बड़े और इकलौते बेटे होने के कारण ऐसा स्वाभाविक भी था। तीन बहनों की शादी का उत्तरदायित्व भी उन्हीं पर था। मेरे ससुर तो दो साल बाद रिटायर होने वाले थे और सास नौकरी नहीं करती थीं। शादी के बाद मैंने उनके बिना कहे ही यह मान लिया कि शरद का साथ मुझे हर कदम पर देना है, फिर चाहे कितनी ही मुश्किलें क्यों न आएं। शरद को मैंने कभी अपने उत्तरदायित्वों को निभाने से नहीं रोका, न ही कभी ताना दिया कि नई-नई शादी होने के बावजूद हमें न तो बहुत घूमने का मौका मिलता है और न ही बहुत अधिक समय साथ बिताने का। शरद के हर फैसलों का मैं लगातार समर्थन करती रही और उनके हर फैसले को सही मान, उन्हें आगे बढ़ने को प्रोत्साहित करती रही। कभी उनकी कोई बात गलत भी लगती, तो इसलिए कुछ नहीं कहती थी कि कहीं उनका मनोबल न टूट जाए। कभी उन्हें राय या सुझाव नहीं दिया, यह सोचकर कि कहीं उन्हें बुरा न लगे, लेकिन मुझे नहीं पता था कि मेरी यह कोशिश शरद को चुभने लगेगी और अपनी नाकामयाबी का जिम्मेदार मुझे ही मानेंगे।
यह तो मुझे बहुत बाद में समझ आया कि मेरा उसकी हर बात और फैसले में हां में हां मिलाने से उन्हें अपनी गलतियों के बारे में पता ही नहीं चला। मैं तो यही मानती थी कि शरद जो भी करते हैं, सही करते हैं।”

यह कहना है भावना का, जिसने अपने पति की हर बात का समर्थन करना अपना कर्तव्य समझा, पर इससे पति के साथ उसके संबंध खराब हो गए और उसकी शादी तक खतरे में पड़ गई।

पर्सनल स्पेस नहीं मिलता
यह सही है कि आपके पार्टनर को आपके साथ की आवश्यकता होती है और हर साथी चाहता है कि उसका साथी उसे सहयोग दे, पर अमेरिका की 'यूनिवर्सिटी ऑफ आयोवा' में हुए एक अध्ययन से यह बात सामने आई है कि बहुत ज्यादा सपोर्ट आपकी शादी को खतरे में डाल सकता है। असल में बहुत ज्यादा सहयोग अंतत: एक हस्तक्षेप का रूप ले लेता है और इस तरह जोड़ों के बीच एक निजता नहीं रहती। मैरिज काउंसलर प्रमिला दुबे मानती हैं कि हर इंसान की जिंदगी में निजता जरूरी है, बेशक वह शादीशुदा ही क्यों न हो। निजता न मिल पाने की स्थिति में उनके बीच तनाव के साथ-साथ उनमें चिड़चिड़ापन भी बढ़ने लगता है और साथी को लगने लगता है कि चूंकि आप उसे लगातार सहारा दे रही हैं, उसकी वजह यह है कि आप उसे काबिल नहीं मानते हैं। ऐसे में वह आपके सहयोग को सकारात्मक तरीके से लेने के बजाय नकारात्मक रूप में ले लेता है। कहा जाता है न कि बहुत ज्यादा मिठास भी रिश्तों में कड़वाहट भर देती है। इसलिए चाहे वो मीठा हो, नमकीन हो या खट्टा, हर तरह का स्वाद वैवाहिक जीवन में होना चाहिए।

कमियों पर ध्यान दिलाएं  
हमेशा साथी का समर्थन करना या उसकी लगातार प्रशंसा करते जाना उसके काम में बाधक हो सकता है। शरद को सौम्या से यही शिकायत थी कि वह बिजनेस से जुड़े गलत निर्णय लेता रहा और वह आंखें मूंद उसे हर बात की स्वीकृति देती रही। एक पत्नी होने के नाते बेशक शरद का साथ देना ठीक हो सकता है, पर अगर उसने एक बार भी उसके निर्णयों के लिए उसे टोका होता या उसकी कमियां बताई होती हैं, तो वह कारोबार को शायद ठीक ढंग से संभाल पाता। वह कई बार उसकी राय मांगता था, पर वह हमेशा यही कहती कि तुम जो भी कर रहे हो, ठीक कर रहे हो या तुम कभी गलत कर ही नहीं सकते हो। शरद को लगने लगा था कि आलोचना भी इंसान की तरक्की व सही फैसले लेने में कभी-कभी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। प्रमिला दुबे कहती हैं कि जब आपका साथी एक बुरे वक्त से गुजर रहा हो, तो उसका समर्थन करना सही लग सकता है, क्योंकि आप उस पर अटूट विश्वास करती हैं, लेकिन यह विश्वास कभी-कभी आपके साथी की कमियों पर पर्दा डाल देता है और वह लगातार भूल करता ही जाता है, जो आगे चलकर उसके करियर में बाधक बन सकती है।

अपने रिश्ते में दरार पैदा करने की खुद ही वजह न बनें

कोई कारण हो तभी...
अक्सर हम लोगों को ऐसी बातें कहते सुनते पाते हैं कि, काश मेरा पति कुछ ज्यादा सहयोग देने वाला होता... मैं हमेशा उसे सहयोग देना चाहता हूं, पर उसे तो मेरी किसी बात की कद्र ही नहीं है... जब वह परेशान होती है तो मैं समझ नहीं पाता कि मुझे क्या करना चाहिए... जिस तरह वह मुझे सहयोग करती है, उससे तो लगता है कि वह मेरे कहे बिना ही मेरे मन की सारी बात समझ लेती है। ये सब बातें सुनने में बेशक बहुत अच्छी लगती हैं, पर आपकी अवांछित सलाह कई बार साथी को परेशान भी कर सकती है।

इसकी वजह यह भी है कि हर समय साथी आपकी सलाह, परामर्श या फिर एक अभिभावक की तरह मार्गदर्शक बनना पसंद नहीं करता है। अक्सर होता भी यही है कि साथी सलाह देते-देते एक अभिभावक की भूमिका में आ जाते हैं और यह बात महिलाओं पर ज्यादा लागू होती है। जबकि एक पुरुष अपनी पत्नी के अतिरिक्त अपने मित्रों, परिवार के अन्य सदस्यों से भी सलाह या सहयोग की अपेक्षा रखता है या उनका भी उसे सहयोग मिलता है। इसलिए पति को जब-तब सहयोग करके अपने रिश्ते में दरार पैदा करने की खुद ही वजह न बनें।

कोई कारण हो तभी...
अक्सर हम लोगों को ऐसी बातें कहते सुनते पाते हैं कि, काश मेरा पति कुछ ज्यादा सहयोग देने वाला होता... मैं हमेशा उसे सहयोग देना चाहता हूं, पर उसे तो मेरी किसी बात की कद्र ही नहीं है... जब वह परेशान होती है तो मैं समझ नहीं पाता कि मुझे क्या करना चाहिए... जिस तरह वह मुझे सहयोग करती है, उससे तो लगता है कि वह मेरे कहे बिना ही मेरे मन की सारी बात समझ लेती है। ये सब बातें सुनने में बेशक बहुत अच्छी लगती हैं, पर आपकी अवांछित सलाह कई बार साथी को परेशान भी कर सकती है।

इसकी वजह यह भी है कि हर समय साथी आपकी सलाह, परामर्श या फिर एक अभिभावक की तरह मार्गदर्शक बनना पसंद नहीं करता है। अक्सर होता भी यही है कि साथी सलाह देते-देते एक अभिभावक की भूमिका में आ जाते हैं और यह बात महिलाओं पर ज्यादा लागू होती है। जबकि एक पुरुष अपनी पत्नी के अतिरिक्त अपने मित्रों, परिवार के अन्य सदस्यों से भी सलाह या सहयोग की अपेक्षा रखता है या उनका भी उसे सहयोग मिलता है। इसलिए पति को जब-तब सहयोग करके अपने रिश्ते में दरार पैदा करने की खुद ही वजह न बनें।

आप खुलकर अपने साथी से बात करें

मनोवैज्ञानिक यह भी मानते हैं कि स्वभाव से पुरुष थोड़े अंतर्मुखी होते हैं, इसलिए समस्याओं से घिरने पर वे अकेला रहना पसंद करते हैं, जबकि औरत चाहती है कि उनकी छोटी-छोटी बातें सुनी जाएं, उनका हाथ पकड़ साथी उसे सांत्वना दे कि सब ठीक हो जाएगा या उसे सीने से लगाकर उसके आंसू पोंछ दे। यही वजह है कि औरतों के पास सहयोग के बहुत सारे जरिए होते हैं और उसे वे अपनी ताकत मानती हैं, जबकि पति को लगता है कि अगर कोई उसे बहुत ज्यादा सहयोग कर रहा है, तो वह इसलिए क्योंकि वह उसे कमजोर या नाकाबिल मानता है।

सलाह पर सलाह
n बेहतर होगा कि बिना प्रमाण के चीजों को समझने या सुझाव देने की प्रवृत्ति से निकलकर सलाह तभी दें , जब आपसे मांगी जाए। तब भी उस पर अपनी बात थोपें नहीं, केवल सुझाव के तौर पर उसके सामने अपनी राय रखें।
n अगर आप अपने साथी से सहयोग चाहती हैं, तो यह मानकर न चलें कि वह आपके दिल और दिमाग में चलने वाली बातों को पढ़ ही लेगा और आपके बिना कहे यह समझ लेगा कि उसे आपका सहयोग चाहिए या नहीं। आप खुलकर अपने साथी से बात करें।
n संवाद कायम रखें। बहुत ज्यादा सहयोग करना या बिल्कुल भी सहयोग न करना, दोनों ही स्थितियां ठीक नहीं हैं। इसलिए संचार कर बीच का रास्ता चुनें। याद रखें एक बैलेंस बनाकर रखना महत्वपूर्ण है।
n अगर आपको साथी से सहयोग चाहिए, तो उससे आग्रह करें, अगर आप सहयोग देना चहती हैं, तो पूछें कि आप किस तरह से उसकी मदद कर सकती हैं। अपने मन या इच्छा से कुछ भी करने की कोशिश
न करें।
n साथी के विश्वास को बनाए रखने के लिए आप भावनात्मक सहारा दे सकती हैं। उसकी क्षमताओं की ओर उसका ध्यान दिलाएं या उसे अहसास कराएं कि किस तरह से वह पहले भी कठिन परिस्थितियों से बाहर आ चुके हैं।
n अपने साथी पर बहुत ज्यादा हक जमाने का आपका व्यवहार भी आपको हर पल साथी को सहयोग देने या उसकी परेशानियों को ओढ़ लेने के लिए उकसाता है। साथी से प्यार करें, उसकी मदद करें, लेकिन उसे इस बंधन में न बांधें कि सिर्फ आप ही हैं जो उसकी हितैषी हैं। उसे दूसरे विकल्पों, यानी मित्रों, रिश्तेदारों आदि को भी तलाशने या सलाह लेने का मौका दें और उसके फैसले का सम्मान करें।

 

'मैं' को भूल जाना ही बेहतर
कुछ साथी, अपने साथी की जरूरतों या भावनाओं को उसके बताने से पहले ही समझने लगते हैं और यह जानने की कोशिश नहीं करते कि वास्तव में उनका साथी क्या चाहता है। यही नहीं, ऐसे साथी स्वयं को किसी मेंटर से कम नहीं समझते और ये मानकर चलते हैं कि उन्हें साथी को सलाह देते रहना चाहिए। यह भूमिका निभाने में धीरे-धीरे उन्हें मजा आने लगता है और वे स्वयं को एक ऊंचे पायदान पर बैठा महसूस करते हैं। इस तरह उनके अहंकार को भी हवा मिलती है। वे मानने लगते हैं कि सिर्फ वही साथी को हर मुश्किल से बचा सकते हैं वहीं, साथी को लगता है मानो उसका दम घुट रहा है। उसकी सोच पर जैसे उसे प्यार करने वाला साथी हावी होने लगता है। तब वह उस बंधन को तोड़ने के लिए बैचेन हो उठता है और झटके से साथी को उस पायदान से नीचे गिरा देता है। जाहिर है तब चीजों को पहले से समझने वाले साथी के अहंकार को ठेस पहुंचती है और आपस में मतभेद आरंभ हो जाता है।