इस घटना के बाद गांधीजी ने तन से कपड़े उतार दिए और घुटने तक धोती पहनने लगे!

2018-12-03 11:07:07

बात आजादी के पहले की है। लखनऊ में कांग्रेस का महाधिवेशन था जिसमें गांधीजी आए थे। वक्ताओं ने तत्कालीन समस्याओें पर विवेचन किया, लेकिन राजकुमार शुक्ल ने किसानों की जो कष्ट-कहानी कही, उसे सुनकर गांधीजी विचलित हो गए। उसकी सचाई अपनी आंखों देखने वे चंपारण पहुंचे। साथ में कस्तूरबा भी थीं। कस्तूरबा भितिहरवा गांव में गईं तो उन्होंने देखा कि किसानों के पास जीने की मूलभूत जरूरतें पूरी करने लायक संसाधन भी नहीं हैं। उनकी औरतों के कपड़े भी बहुत गंदे और जर्जर थे। कस्तूरबा ने गांव की औरतों की एक सभा बुलाई और उन्हें साफ-सफाई का महत्व समझाने लगीं।इस पर एक गरीब किसान की औरत सभा के बीच खड़ी हुई। उसके कपड़े बहुत गंदे थे। वह कस्तूरबा को अपनी झोपड़ी में ले गई। अपनी झोपड़ी दिखाकर वह बोली, ‘माताजी! देखो, मेरे घर में कुछ नहीं है। बस, मेरी देह पर यह एक धोती है। बताइए, मैं क्या पहनकर धोती साफ करूं? आप गांधीजी से कहकर मुझे एक धोती दिलवा दें तो फिर मैं पूरी साफ-सफाई से रहूंगी।’ कस्तूरबा उसकी बातें सुनकर और वहां की दयनीय स्थिति देखकर भाव-विह्वल हो गईं। उन्होंने गांधीजी को सारी स्थिति बताई।

लेकिन गांधीजी पर इसका विचित्र प्रभाव पड़ा। उन्होंने सोचा, ‘इन किसान औरतों जैसी हालत तो देश में लाखों बहनों की होगी। जब तक इन सभी औरतों के तन को ढंकने के कपड़े नहीं मिलते हैं, तब तक मेरा कुर्ता-धोती और चादर पहनना उचित नहीं है। जब मेरी लाखों बहनों को गरीबी एवं अभाव के कारण तन ढंकने को कपड़े नहीं मिलते तो मुझे इतने सारे कपड़े शरीर पर लादे रहने का क्या हक है?’ बस उसी दिन से गांधीजी ने संकल्प ले लिया कि वे केवल घुटनों तक धोती पहनकर ही रहेंगे। चंपारण की इन स्थितियों ने ही गांधीजी के तन पर से कपड़े उतार दिए।


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