पुरुषार्थ बिना मुक्ति संभव नहीं--प्रशांतमन प्रियंकरा श्री जी,अमृत प्रवचन श्रृंखला प्रवाहित

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नीमच 5फरवरी (केबीसी न्यूज़ ) संसार असार है मनुष्य जन्म दुर्लभ है यह बात पाट पर विराजमान हर साधु साध्वी महाराज साहब बार-बार कहते हैं लेकिन क्या हमें कभी समझ आया इस विषय का एक उदाहरण‌ एक बार जब दुष्काल पड़े  गांव में टीवी रिपोर्टर से गांव में ग्रामीण प्रश्न पूछता है और उसके सवालों से रिपोर्टर घबरा जाता है तब ग्रामीण रिपोर्टर से कहता है कि ऐसे ही बैसिर पैर की बातें करते पूरा दिन बिता देते हो तब कैसा लगता है उदाहरण से समझाया कि बार-बार एक ही प्रश्न संसार असार है मनुष्य जन्म दुर्लभ है सुन सुनकर क्या तुम्हारी स्थिति भी वैसी नहीं हो गई है।यह बात साध्वी महतरा मनोहर शिशु परम पूज्य प्रज्ञा नीधि प्रशांत मन प्रियंकरा श्री जी मसा ने कही।वे जैन श्वेतांबर महावीर जिनालय मंदिर ट्रस्ट विकास नगर  के तत्वाधान में  आराधना भवन में आयोजित धर्म सभा में बोल रही थी। उन्होंने कहा कि‌ संसार असार है इतनी बार सुनने के बाद भी क्या हमें लगा क्या चिंतन हुआ पर में लगे रहते हैं जहां चार मिले पंचायत शुरू, क्या कभी चिंतन के विषय में विचार किया है क्या यह विचार आया कि कितने पुण्य के बाद मनुष्य जन्म सभी सुविधाएं सुख संपत्ति के साथ जिन शासन मिला है क्या कभी लगता है विचार आता है कि एक उदाहरण त्रियंच व मनुष्य का देते हुए बताया कि कैसे एक मनुष्य का बच्चा व कैसे एक   त्रियंच का बच्चा समान रूप से जीवन जी रहे हैं दोनों में समानता है दूसरों के लिए माता-पिता पत्नी बच्चों के लिए जी रहे हैं स्वयं के लिए समय ही नहीं है आत्म कल्याण की व्यवस्था ही नहीं है। टामी की तरह ही बंटी का जीवन चल रहा है संसार के कार्यों में पूरी तरह संलग्न वह आसक्त हैं लेकिन जिन शासन व जिनवाणी में बताएं पर कितना तटस्थ है क्या ऐसे ही है की पूजा के बिना नवकारसी के बिना या जब भी उपदेश है इनके बिना मेरा नहीं चलता है कभी लगा ऐसा आज भी जिन शासन व मनुष्य जन्म की सार्थकता नहीं समझ आई ।मांगते हैं जिन शासन मिले लेकिन साथ ऐसा परिवार मिले ऐसे पड़ोसी मिले ऐसा नाम पैसा मिले तब में पुरुषार्थ कर पाऊं शायद। अभी इस संसार में ही उलझे एवं फंसे हैं। बिना पुरुषार्थ  मुक्ति संभव नहीं है ।इस आरे में मोक्ष नहीं है लेकिन क्या सोचा की उत्कृष्ट आराधना हो महाविदेह क्षेत्र में जन्म मिले और 8 वर्ष की उम्र में रजोहरण और केवल ज्ञान  प्राप्त हो मोक्ष मिले पर से हटकर स्वयं में लिन होना पड़ेगा ।यह सार समझ आया तो मनुष्य जीवन की सार्थकता है। सामायिक पर व्याख्यान देते हुए साध्वी श्री जी महाराज साहब ने कहा कि सामायिक समभाव में रहना सिखाती है केरेमी भंत का अर्थ है कि में पाप से पीछे हट रहा हूं कोरी मन से वचन से काया से पाप नहीं करूंगा नहीं करवाऊंगा लेकिन अनुमोदना का पाप लगता ही है किसी न किसी माध्यम से लेकिन साधू व कोरी जिसमें पाप से दूर न करना ना कराना और साथ ही अनुमोदना भी नहीं करना ,48 मिनट क्यों तय है दो घड़ी क्योंकि उत्कृष्ट भाव अगर हो तो भाव से ही केवल ज्ञान व केवल चरित्र को प्राप्त कर सकते हैं उदाहरण देते हुए गजसुकुमार इलायची पुत्र व आई मुक्त मुनि सर का संस्मरण सुनाते हुए कहा की रस्सी पर नृत्य करते भावों की उत्कृष्ट करने केवल ज्ञान केवल चरित्र तक पहुंचा दिया वही ईरीयाहियम  बोलते - बोलते केवल ज्ञान की प्रति ऐसे नहीं है वेदना में समता भाव से केवल ज्ञान यह उस वक्त का पुरुषार्थ था लेकिन इसके पीछे पूर्व भावों की उत्कृष्ट साधना का प्रतिफल था कि चढ़ते भावों ने मोक्ष मार्ग आसान कर दिया पंचम आरे में मोक्ष नहीं है लेकिन उत्कर्ष साधना में निकट भव में मोक्ष दिला सकती है।समाज जनों  ने चातुर्मास के लिए की विनती-धर्म सभा में श्वेतांबर जैन समाज जनों द्वारा साध्वी महाराज साहब आदि ठाणा 6 से विकास नगर महावीर जिनालय में आगामी चातुर्मास की स्वीकृति प्रदान करने और धर्म प्रवचन सभा एक दिन और करने  और आशीर्वाद प्रदान करने की विनती भी की गई। विनती करते समय समाज के वरिष्ठ प्रेम प्रकाश जैन ,महावीर जिनालय ट्रस्ट अध्यक्ष राकेश जैन आंचलिया, सचिव राजेंद्र बंबोरिया ,उपाध्यक्ष राजमल छाजेड ,सुंदर तांतेड,राहुल जैन, सहित बड़ी संख्या में समाजजन उपस्थित थे।