मां और पत्नी के बीच जब चुनने का आए मौका, तो ये टिप्स अपनाएं!

शादी के बाद ज्यादातर पुरुषों को ये समस्या हो जाती है कि वो अपने मां की सुने या पत्नी की सुने. शादी के पहले तो मर्द मां की सुनते हैं लेकिन पत्नी के आ जाने के बाद अपनी मां को थोड़ा कम टाइम दे पाते हैं. ज्यादातर पुरुषों को अपने परिवार ये बात सुनने में काफी खराब लगता है कि वो अपनी पत्नी की बात सुनते हैं. इसीलिए ज्यादातर विवाहित इन दोनों रिश्तों में संतुलन बनाने की कोशिश करते रहते हैं. बाद में ये डर उन पर कुछ ज्यादा ही हावी हो जाता है. जिसकी वजह से विवाहित लड़का अपनी पत्नी के साथ अगर 5 मिनट बिताता है तो मां के साथ कम से कम 10 मिनट बिताने की कोशिश करता है.

अधिकतर पुरुष मां और पत्नी की लड़ाई में पिसा हुआ महसूस करते हैं और दोनों के बीच में लडाई की स्थिति में तो पुरुष काफी ज्यादा परेशान होता है. इसको सुनो तो वो नाराज हो उसको सुनो तो वो नाराज हो.

दरअसल, ये धारणा ही गलत है कि मां और पत्नी को बराबर की अहमियत दी जानी चाहिए. मां और पत्नी को एक तराजू पर रखने की समाज की कोशिश भी गलत है. लोग अधिकतर शादी के बाद महिलाओं के सामने आने वाली मुश्किलों को नजरअंदाज करते हैं. शादी के बाद लड़की की पूरी जिंदगी कैसे बदल जाती है, इसकी तरफ किसी का ध्यान नहीं जाता है. हालाकि दोनों महिलाओं को खुद भी एक दुसरे को सम्मान देना चाहिए. क्योंकि मां ने बच्चे को जन्म दिया है और उसके अंदर भी उसी मां के संस्कार हैं. साथ ही जो बहु आई है वो भी किसी दूसरे की संतान है जो अपना घर बार सब कुछ छोड़कर आपके घर को रौशन करने आई है. 

क्या सच में ऐसे किसी संतुलन की जरुरत है?

अगर कोई पति अपनी बीवी को ज्यादा वक्त देता है तो यह बिल्कुल जायज है क्योंकि वह आपकी जिंदगी में तुरंत आई है और उस लड़की को समझने में थोड़ा तो समय देना ही चाहिए. लड़की अपना घर छोड़कर अपने पति के परिवार में आती है और शादी के शुरुआती दिनों में इस संबंध की नीव मजबूत होती है. अगर पति अपनी पत्नी के साथ ज्यादा वक्त बिताता है तो इसे इस तरह से बिल्कुल नहीं देखा जाना चाहिए कि वह किसी के बेटे उससे दूर ले जा रही है. बल्कि इसे इस तरह से लिया जाना चाहिए कि दोनों एक दूसरे को समझने का प्रयास कर रहे हैं.

जब कोई भी लड़का अपनी बीवी को सपोर्ट करना शुरू करता है तो परिवार में असुरक्षा की भावना पैदा होनी शुरू हो जाती है और लड़के को इसके लिए खरी खोटी सुनाई जाती है और तो और उसे जोरू का गुलाम भी कह दिया जाता है. मां पर भी यही बात लागू होती है. लड़के को अपनी मां के साथ वक्त बिताने और उसकी देखभाल का भी पूरा हक है इसलिए पत्नी को भी मां और बेटे के बीच में नहीं आना चाहिए.

ये मां और बीवी वाली प्रतिस्पर्धा सचमुच में तो समाज के द्वारा मनगढंत तौर पर बनाई गई है. इसलिए ज्यादा दूसरों की नहीं सुननी चाहिए और कोशिश करना चाहिए कि खुद सबके साथ बैठकर इन सारे बातों को सुलझा लिया जाए.