2026-08-18 09:04:10
विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस पर साहित्य परिषद की गोष्ठी सम्पन्न
नीमच | अखिल भारतीय साहित्य परिषद जिला नीमच द्वारा विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस पर आयोजित कवि एवं विचार गोष्ठी का प्रारंभ राधेश्याम शर्मा की कविता से हुआ | उन्होंने सहादत हसन मंटो की कहानी टोबा टेकसिंह , खुशवंतसिंह के उपन्यास पंजाब मेल , अमृता प्रीतम के उपन्यास पिंजर का उल्लेख करते हुए विभाजन के शिकार हुए लोगों की वेदना और दर्द को उकेरा| गोष्ठी के प्रारंभ में संस्था अध्यक्ष ओमप्रकाश चौधरी ने सभी उपस्थित व्यक्तियों का स्वागत करते हुए कहा कि विभाजन के समय एक ओर देश स्वतंत्रता की खुशियां मना रहा था वहीं लाखों लोग विभाजन का दंश झेलते हुए दुखी होकर रो रहे थे | सड़कें और रेलगाड़ियां लाशों से पटी पड़ी थी | इस विभीषिका के परिणाम हम आज तक भोग रहे हैं | महिपालसिंह चौहान ने अपनी कविता में कहा कि स्वतंत्रता की जंग लड़ने वालों की शहादत को तो याद किया जाता है, लेकिन विभाजन के कारण अपनी जान गँवाने वालों को कोई नहीं पूछता | जिन्हे सत्ता चाहिए थी उन्होंने सत्ता के लिए बटवारे को मंजूर कर लिया | आशीष सोनी का विचार था कि विभाजन का दर्द झेलकर हम आजाद हुए हैं | इसलिए हमें नई पीढ़ी को इस बात के लिए शिक्षित करना होगा कि वह अब ऐसे किसी कार्य में साथ न दे जिससे कोई नया विभाजन हो | अजय जिंदल का कहना था कि विभाजन की कड़वी यादों को स्मरण रखते हुए हमें ऐसा भारत बनाना है जहां फिर कोई विभाजन के बीज न बो सके |उस समय की राजनीतिक महत्वाकांक्षा का दंड आम जनता ने भुगता और लाखों लोगों को अपनी इच्छा के विरुद्ध विस्थापित होना पड़ा | इस दिवस का सबक यही है कि अब मानवता को किसी कि सत्ता की महत्वाकांक्षा की बलि न चढ़ना पड़े | अनील डबकरा ने फ़्रीडम एट मिडनाइट पुस्तक का उल्लेख करते हुए कहा कि विभाजन की त्रासदी पर बहुत लिखा गया है | विभाजन धार्मिक कट्टरता तथा अंग्रेजों की फूट डालो और राज करो की नीतियों का परिणाम था | कवि धर्मेन्द्र शर्मा ने कहा कि भारत विभाजन की पृष्ठभूमि तो उसी दिन तैयार हो गई थी जब बंगाल में 1946 में डाइरेक्ट एक्शन की हैवानियत में हिंदुओं का कत्लेआम हुआ था | अंग्रेजों ने तो भारत को असंख्य टुकड़ों में बांटने का षड्यन्त्र रचा था परंतु सरदार पटेल की दूरदर्शिता ने ऐसा होने नही दिया | उन्होंने अपनी कविता की पंक्तियों में कहा- जीत गई जिन्ना की जिद, नेहरू भी मन ही मन हर्षाये |मजहब की लकीर यूं खीची कि हम आज तक उबर नहीं पाए | 14 अगस्त कैसे भूलें थी खून से लथपथ धरती /जो सत्ता सुख में डूब गए धिक्कार उन्हे ,जो बलिदान हुए नमन उन्हे करता हूँ | श्रीमती रेणुका व्यास ने अपनी कविता के माध्यम से वन्दे मातरम के गौरव गान को याद किया और उसे नव जागरण का मंत्र बताया | परिषद के महासचिव अंबिका प्रसाद जोशी ने अपने समापन वक्तव्य में कहा कि यह अतीत को स्मरण करने और भविष्य के लिए सीखने का अवसर है | हम विभाजन की पीड़ा को याद रखें और इससे सीखें कि यह बीमारी अब न पनपे |साथ ही उन्होंने सभी उपस्थित श्रोताओं और अन्नपूर्णा सेवा न्यास के प्रति आभार व धन्यवाद ज्ञापित किया | इस अवसर पर अन्नपूर्णा सेवा न्यास के अध्यक्ष श्रीराम गोडबोले ,सचिव प्रकाश मंडवारिया ,संयोजक राकेश पप्पू जैन , दिनेश शर्मा ,राजमल व्यास , अभिषेक कोठारी, श्रीमती जयश्री चौबे , कैलाश बाहेती ,हरीश उपाध्याय ,लोकेन्द्र बैन्स ,शंभूलाल बम ,प्रकाश भट्ट आदि उपस्थित थे |
